(रायपुर/नई दिल्ली) परम्पराओं और संस्कृति के माध्यम से जल को संरक्षित किया जाए- बृजमोहन अग्रवाल

रायपुर/नई दिल्ली, 20 सितंबर (आरएनएस)। छत्तीसगढ़ के जलसंसाधन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने कहा हैं कि, जल संस्कृति व जल के संरक्षण की कहानी मानव सभ्यता के विकास के समान ही पुरानी हैं। खास कर जब बात छत्तीसगढ़ की हो तो नदी, तालाब, कुंए के बिना इसके इतिहास को समझना नामुमकिन ही हैं। छत्तीसगढ़ की लोककथाओं, परंपराओं में तालाब, कुएं आदि के निर्माण तथा इसके संरक्षण के उपायों की कई गाथाएं दर्ज हैं। छत्तीसगढ़ में लोकगीतों, गाथाओं में ऐसी कई कहानियां बसती हैं जिनका सीधा संबंध जल संरक्षण से हैं। वे आज नई दिल्ली के इंदिरागांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में, ÓÓजल संस्कृतिÓÓ पर आयोजित कार्यशाला में बोल रहे थे। कार्यशाला का आयोजन दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा आयोजित किया गया था। इस अवसर पर सुरेश सोनी सहित देश के अनेक राज्यों से आए गणमान्य नागरिकगण भी उपस्थित थे।
अग्रवाल ने कहा कि, जल संरक्षण के संबंध में हमारे देश में जो पुरानी संस्कृति रही हैं यदि हम उन संस्कृति को फिर से जीवित करेंगे तो हमारे नदी, नाले, तालाब, पानी से फिर से भर जाएंगे। प्राचीन समय में किस प्रकार जल को संरक्षित कर उसका महत्व लोक-कथाओं, तीज त्यौहारो में देखने को मिलता था उसका उन्होने विस्तृत उदाहरण कार्यशाला में दिया। उन्होने बताया कि, छत्तीसगढ़ का ÓजलÓ के साथ अनोखा रिश्ता हैं। संभवत: छत्तीसगढ़ दुनिया का अकेला प्रदेश हैं जहॉ बादलों की पूजा होती है। यहां के सरगुजा जिले के रामगढ़ में हर साल आषाढ़ के महीने के प्रथम दिन बादलों की पूजा होती हैं। महाकवि कालिदास ने यहीं आकर ÓÓमेघदूतमÓÓ महाकाव्य की रचना की थी। अग्रवाल ने कहा कि, पानी की समृध्द संस्कृति को संरक्षित कर उसका डाक्युमेंनटेशन किया जाना आवश्यक हैं। आज यह आवश्यक हो गया है कि, परम्पराओं व संस्कृति का उपयोग पानी बचाने के लिए कैसे करे इस पर ध्यान देना होगा।
अग्रवाल ने कहा छत्तीसगढ़ की पहचान तालाबो से ही होती हैं। छत्तीसगढ़ के कई कहावतो से भी तालाबों के महत्व का पता चलता हैं। बिलासपुर के गांवों रतनपुर, मल्हार, खरौद आदि गांवो को Óछै आगर, छै कोरीÓ यानि 126 तालाबों वाला गॉव कहा जाता है। सरगुजा, बस्तर के गांवो को Óसात आगर सात कोरीÓ यानि 147 तालाबों वाला गॉव माना जाता हैं। Óलखनपुर में लाख पोखराÓ यानि सरगुजा की लखनपुर में लाख तालाब कहे जाते थे, आज भी यहां कई तालाब संरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ में तालाबों के संरक्षण की पहल को यहा की परंपराओं में भी देख सकते है। यहा के प्रसिध्द लोक त्यौहार छरे-छेरा में घर-घर जाकर धान की फसल को दान में मांगा जाता है जिसे एकत्रित कर तालाब की साफ सफाई में खर्च किया जाता हैं। उन्होने कहा जलसंरक्षण को सबसे ज्यादा क्षति ट्यूबबेल से हुई है। हमें फिर से कुओं की पुरानी संस्कृति को शुरू करना होगा। कुएं जल के स्तर को बनाए रखते हैं जिससे सिंचाई व पीने के लिए पानी की कमी दूर हो सकती है।

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