अभिमन्यु को रोका मगर यस मैन हासिल नहीं कर पाए खट्टर

0-हरियाणा भाजपा अध्यक्ष पद पर सियासी महाभारत
0-भाजपा नेतृत्व ने दूसरे राज्यों को भी दिया संदेश
0-अंतिम समय में अभिमन्यु को रेस से बाहर कर धनखड़ बने नेतृत्व की पहली पसंद
नई दिल्ली,19 जुलाई (आरएनएस)। आखिरकार तीन महीने की सियासी माथापच्ची के बाद हरियाणा में भाजपा को नया अध्यक्ष मिल गया। हालांकि इस पूरी लड़ाई में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टïर एड़ी चोटी का जोर लगाने के बावजूद अपने पसंदीदा चेहरे को संगठन की कमान नहीं दिला पाए। भाजपा नेतृत्व ने इस पद पर पूर्व मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ को नियुक्त कर साफ संदेश दिया है कि पार्टीशासित राज्यों में अब मुख्यमंत्रियों को अध्यक्ष के रूप में यस मैन नहीं मिलेगा।
यूं तो हरियाणा में अध्यक्ष पद के लिए माथापच्ची मार्च महीने में ही शुरू हो गई थी। हालांकि अप्रैल महीने में ही केंद्रीय नेतृत्व ने साफ कर दिया था कि वह राज्य में संगठन की कमान जाट बिरादरी के नेता को देना चाहता है। सूत्रों के मुताबिक उस दौरान गृह मंत्री अमित शाह की पहली पसंद पूर्व मंत्री कैप्टन अभिमन्यु थे जबकि वर्तमान अध्यक्ष जेपी नड्डïा के करीबी होने के कारण धनखड़ भी इस पद के प्रबल दावेदार थे। इसके बाद प्रदेश में अलग-अलग गुटों में संगठन का पद हासिल करने के लिए वार-पलटवार शुरू हो गया।
हर दांव आजमा कर भी फेल हुए खट्टïर
अध्यक्ष पद के सवाल पर सीएम मनोहर लाल खट्टïर ने हर दांव आजमाया। उन्होंने पहले कोशिश की कि वर्तमान अध्यक्ष सुभाष बराला को ही एक बार फिर से अध्यक्ष बनाया जाए। सूत्रोंं के मुताबिक नेतृत्व की ना के बाद सीएम ने गैरजाट चेहरे को संगठन की कमान दिलाने के लिए पूरी ताकत लगाई। इस मुहिम में उन्हें पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह का भी साथ मिला। इस क्रम में सीएम की ओर से कृष्णपाल गुर्जर का नाम प्रस्तावित किया गया। इसी दौरान संदीप जोशी और महिपाल ढांढा के लिए भी प्रयास हुए। जोरआजमाइश के बीच सीएम ने दो बार पीएम नरेंद्र मोदी, तीन बार नड्डïा और दो बार शाह से भी मुलाकात की। हालांकि इन मुलाकातोंं में नेतृत्व ने साफ कर दिया कि प्रदेश में संगठन की कमान न सिर्फ जाट बिरादरी को दी जाएगी, बल्कि अनुभव को भी तरजीह दी जाएगी।
अंतिम समय में कटा अभिमन्यु का पत्ता
सूत्रों का कहना है कि शाह की पसंद पूर्व मंत्री अभिमन्यु थे। सीएम न तो अभिमन्यु और न ही धनखड़ के नाम पर राजी थे। उन्होंने किसी तीसरे को संगठन की कमान दिलाने की हर संभव कोशिश की। बताते हैं कि कई दौर की माथापच्ची के बाद आखिरकार सीएम ने धनखड़ के नाम पर सहमति दी। माना जा रहा है कि अब अभिमन्यु को केंद्रीय संगठन में भूमिका दी जाएगी।
जाट ही क्यों?
दरअसल भाजपा नहीं चाहती कि उसकी ओर से जाट बिरादरी को नकारात्मक संदेश जाए। भले ही हरियाणा में यह बिरादरी कांग्रेस, जजपा की करीबी है, मगर पश्चिम उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान और मध्यप्रदेश में यह बिरादरी भाजपा के पक्ष में वोट करती रही है। फिर पार्टी की रणनीति जाट बिरादरी में पैठ बनाने की है।
क्या है संदेश?
दरअसल लोकसभा चुनाव के बाद जिन चार राज्यों महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए, उसमें भाजपा को तगड़ा झटका लगा। पार्टी के हाथ से झारखंड और महाराष्ट्र की सत्ता चली गई, हरियाणा में जजपा की बैसाखी पर सरकार बनी तो दिल्ली में शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। लोकसभा की तुलना में विधानसभा चुनाव में हरियाणा में 17 फीसदी तो झारखंड में 22 फीसदी वोट घट गए। उस दौरान हुई समीक्षा में यह पाया गया कि राज्य में जिसे पार्टी ने चेहरा बनाया, उस चेहरे से वोट बढऩे के बदले और घट गए। तभी यह तय किया गया था कि जरूरत पडऩे पर राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन किया जाए और पार्टीशासित राज्यों में संगठन की कमान सीएम के यस मैन को ना दिया जाए।
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