भारत और विश्व बैंक के बीच हुआ 450 मिलियन डॉलर का ऋण समझौता

नईदिल्ली,17 फरवरी (आरएनएस)। भारत सरकार और विश्व बैंक ने आज 450 मिलियन डॉलर के ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसका मुख्य उद्देश्य देश में भूजल के घटते स्तर को रोकना और भूजल से जुड़े संस्थानों को मजबूत बनाना है।
विश्व बैंक से सहायता प्राप्त अटल भूजल योजना (एबीएचवाई)-राष्ट्रीय भूजल प्रबंधन सुधार कार्यक्रम को गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश में कार्यान्वित किया जाएगा और यह 78 जिलों को कवर करेगा। इन राज्यों में प्रायद्विपीय भारत के कठोर चट्टान वाले जलभृत और सिंधु-गंगा के मैदानी इलाके के कछारी जलभृत दोनों ही मौजूद हैं। विशेष मानदंडों के आधार पर इनका चयन किया गया जिनमें भूजल का दोहन एवं क्षरण, सुस्थापित वैधानिक एवं नियामकीय साधन, संस्थागत तैयारियां और भूजल के प्रबंधन से संबंधित पहलों को लागू करने से जुड़े अनुभव शामिल हैं।
इस कार्यक्रम से अन्य बातों के अलावा जलभृतों का पुनर्भरण बढ़ेगा, जल संरक्षण से जुड़े उपायों की शुरुआत होगी, जल संचयन, जल प्रबंधन एवं फसल अनुरूपता से संबंधित कार्यकलापों को बढ़ावा मिलेगा, सतत भूजल प्रबंधन के लिए संस्थागत संरचना का सृजन होगा और भूजल के निरंतर प्रबंधन के लिए समुदायों तथा संबंधित हितधारकों को समर्थ बनाया जाएगा।
वित्त मंत्रालय के आर्थिक कार्य विभाग में अपर सचिव समीर कुमार खरे ने कहा कि भारत में भूजल दरअसल ग्रामीण एवं शहरी घरेलू जलापूर्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत है और इसके स्तर में कमी होना चिंता का विषय है। अटल भूजल योजना का उद्देश्य सहभागितापूर्ण भूजल प्रबंधन से जुड़ी संस्थागत रूपरेखा को मजबूत बनाना और सतत भूजल संसाधन प्रबंधन के लिए समुदाय स्तर पर लोगों की आदतों या व्यवहार में बदलाव लाने को प्रोत्साहित करना है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस एवं अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी से जुड़ी अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के उपयोग से इस कार्यक्रम के बेहतर कार्यान्वयन में और भी अधिक मदद मिलेगी।
उपर्युक्त ऋण समझौते पर भारत सरकार की ओर से आर्थिक कार्य विभाग में अपर सचिव समीर कुमार खरे और विश्व बैंक की ओर से कंट्री डायरेक्टर (भारत) जुनैद अहमद ने हस्ताक्षर किए।
अहमद ने कहा कि भूजल दरअसल भारत का सर्वाधिक महत्वपूर्ण जल भंडार है और इस राष्ट्रीय संसाधन का समुचित प्रबंधन समय की मांग है। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम ग्रामीण आजीविका में योगदान देगा और जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ता प्रदान करेगा। हालांकि, इसका प्रभाव विश्व स्तर पर भी पड़ेगा, क्योंकि यह विश्व भर में भूजल प्रबंधन से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में से एक है।
पिछले कुछ दशकों में लाखों निजी कुओं के निर्माण के जरिए भूजल के दोहन में भारी वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 1950 और वर्ष 2010 के बीच ड्रील किए गए नलकूपों की संख्या 01 मिलियन से बढ़कर लगभग 30 मिलियन हो गई। इससे भूजल संचित क्षेत्र को लगभग 3 मिलियन हेक्टेयर से बढ़ाकर 35 मिलियन हेक्टेयर से भी अधिक के स्तर पर पहुंचाना संभव हो गया। भूजल मौजूदा समय में लगभग 60 प्रतिशत सिंचाई जल मुहैया कराता है। भारत में 80 प्रतिशत से भी अधिक ग्रामीण एवं शहरी घरेलू जलापूर्ति भूजल के जरिए संभव हो रही है। इस आधार पर भारत पूरी दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता (यूजर) है।
यदि वर्तमान रुझान आगे भी जारी रहता है तो 60 प्रतिशत जिलों में दो दशकों के भीतर ही भूजल में हो रही कमी खतरनाक स्तर पर पहुंच जाएगी और वैसी स्थिति में कम-से-कम 25 प्रतिशत कृषि उत्पादन जोखिम में पड़ जाएगा। जलवायु परिवर्तन से भूजल संसाधनों पर वर्तमान दबाव काफी अधिक बढ़ जाएगा।
इस कार्यक्रम के तहत जल बजटों और जल सुरक्षा योजनाओं (डब्ल्यूएसपी) के समुदाय आधारित विकास के लिए विशिष्ट से सामान्य लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाली नियोजन प्रक्रिया की शुरुआत की जाएगी। वाटर बजट के तहत सतही जल एवं भूजल की स्थितियों का आकलन मात्रा एवं गुणवत्ता दोनों ही दृष्टि से किया जाएगा और मौजूदा एवं भावी जरूरतों का पता लगाया जाएगा। वहीं, दूसरी ओर डब्ल्यूएसपी के तहत भूजल की मात्रा बढ़ाने पर फोकस किया जाएगा और प्रस्तावित कदमों पर अमल के लिए चयनित राज्यों को प्रोत्साहन दिया जाएगा। समुदाय की अगुवाई में इस तरह के प्रबंधन वाले उपायों से उपयोगकर्ताओं को खपत के रुख से अवगत होने में मदद मिलेगी और ऐसे आर्थिक उपायों का मार्ग प्रशस्त होगा जिनसे भूजल की खपत में कमी आएगी।
वरिष्ठ जल संसाधन प्रबंधन विशेषज्ञ और इस कार्यक्रम के लिए विश्व बैंक के टास्क टीम लीडर अबेदलरज्क खलील और सत्य प्रिय ने कहा, ‘यह कार्यक्रम जमीनी स्तर पर हो रहे विभिन्न कार्यों में आवश्यक सहयोग प्रदान करेगा जो समुदाय के स्वामित्व और जल संसाधनों के समुचित प्रबंधन पर आधारित हैं। भूजल के अत्यधिक दोहन एवं क्षरण की स्थिति को पलटना लाखों लोगों एवं समुदायों के हाथों में है जिन्हें उचित प्रोत्साहन, सूचनाएं, सहयोग एवं संसाधन देने की जरूरत है, ताकि भूजल के अपेक्षाकृत अधिक सतत विकास और प्रबंधन की ओर अग्रसर हुआ जा सके।
फसल प्रबंधन एवं विविधीकरण फोकस वाले अन्य क्षेत्र हैं। अध्ययनों से पता चला है कि भूजल से सिंचित क्षेत्र में 1 प्रतिशत की वृद्धि होने पर ग्रीन हाउस गैस (जीएचजी) के उत्सर्जन में 2.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है। उधर, सिंचाई दक्षता में 1 प्रतिशत की वृद्धि होने पर जीएचजी के उत्सर्जन में 20 प्रतिशत की कमी आएगी। इस कार्यक्रम के तहत उत्पादकता बढ़ाने के लिए छिड़काव और ड्रिप सिंचाई सहित सूक्ष्म-सिंचाई प्रणालियों को अपनाने के लिए आवश्यक सहयोग दिया जाएगा। इसके साथ ही इस कार्यक्रम के तहत कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों को अपनाने के लिए किसानों को आवश्यक सहायता दी जाएगी।
इस प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के उद्देश्य से सरकार भूजल प्रबंधन से जुड़े लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रोत्साहनों के रूप में कुल धनराशि का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 80 प्रतिशत) जिलों एवं ग्राम पंचायतों सहित स्थानीय सरकारों को हस्तांतरित करेगी। शेष राशि का उपयोग चयनित राज्यों में भूजल के सतत प्रबंधन के लिए तकनीकी सहयोग देने और संस्थागत व्यवस्थाओं को मजबूत करने में किया जाएगा।
अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (आईबीआरडी) से मिलने वाले 450 मिलियन डॉलर के ऋण में 6 वर्षों की मोहलत अवधि और 18 वर्षों की परिपक्वता अवधि होगी।
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